आयुर्वेद दवाओं/प्रोडेक्ट्स की लैब टेस्टिंग क्या होती है? – Precise Ayurveda

आयुर्वेद दवाओं/प्रोडेक्ट्स की लैब टेस्टिंग क्या होती है?

आयुर्वेद दवाओं/प्रोडेक्ट्स की लैब टेस्टिंग

हम अक्सर आयुर्वेदिक दवाओं, प्रोडक्ट्स के बारे मे लोगों के दावे सुनते है की हमारी दवा या हमारा प्रोडक्ट टेस्ट्ड है या लैब टेस्टड है; कुछ लोग दावा करते है की हमारा प्रोडक्ट बहुत ही ज्यादा अच्छा है, चाहे तो लैब मे टेस्ट करवा सकते है। पर क्या आपने कभी सोचा है की आयुर्वेद प्रोडक्टस/दवा की क्या क्या लैब टेस्टिंग होती है, किस टेस्टिंग से हमे क्या पता चलता है, ये टेस्टिंग कहाँ से होती है? लोगों के इन दावों की पोल को कैसे समझे? चलिए आज इसे ही जानते है।

(यहाँ पर दवा के साथ प्रोडेकट शब्द काम मे लिया जाने का मतलब उन प्रोडक्ट्स से है जो की है तो आयुर्वेदिक मेडिसिन, पर बाज़ार मे बेचे जाते है कोस्मेटिक (सौंदर्य प्रसाधन), फूड सप्लीमेंट और इम्युनिटी बूस्टर के नाम से।)

मोटे तौर पर कहें तो आयुर्वेद दवा/प्रोडेक्ट की तीन तरह की टेस्टिंग होती है- पहली क्वालिटि टेस्टिंग (Quality testing) जिसमे दवा/प्रोडेक्ट बनाने मे काम मे आने वाली कच्ची औषधियों (Raw material), बनाने की प्रक्रिया के कुछ ज़रुरी स्टेप्स (क्रिटीकल स्टेप्स/In process critical steps) और तैयार प्रोडेक्ट (finished product) की कुछ पैरामीटर्स (मापदण्डों) पर टेस्टिंग़ की जाती है; दूसरी है सेफ्टी टेस्टिंग, जो की फिनिष्ड प्रोडेक्ट कि सेफ्टी परखने के लिए की जाती है की यह शरीर के लिए हानिकरक/नुकसान दायक तो नही, इस तरह का कोई प्रभाव तो इंसानी शरीर पर नही डालता; तीसरी है एफीकेसी टेस्टिंग इसमे फिनिष्ड प्रोडेक्ट की एफीकेसी चैक की जाती है की वह जिस काम के लिए या जिस परेशानी मे काम मे लिया जाना वांछित है उसमे असरकारक है भी के नही। अगर किसी प्रोडेक्ट की ये तीनो तरह की टेस्टिंग सही तरह से और कडे पैरामीटर्स पर की जाए तो उसके बेहतरीन होने की सम्भावना बढ जाती है। चलिए तीनो को एक एक करके अच्छे से समझते है।

क्वालिटी टेस्टिंग (Quality testing)

इसे समझने के लिए हमे मेडिसिन बनाने के सिस्ट्म को थोडा समझना होगा। इसके लिए कच्ची औषधि (रॉ मैटीरियल) को प्रोसेस किया जाता है और प्रोसेस पूरा होने के बाद यह तैयार मेडिसिन या फिनिष्ड प्रोडक्ट की शक्ल में आता है (मेडिसिन बनाने की बारे में ज्यादा जानकारी के लिए यहां क्लिक करें)। रॉ मैटीरियल से फिनिष्ड प्रोडेक्ट बनने तक कई तरह की टेस्टिंग की जाती है वह क्वालिटी टेस्टिंग में आती है, इसे क्वालिटी कंट्रोल भी कह सकते है। सबसे पहले रॉ मटेरियल (कच्ची औषधि) जो कि हर्ब (पेड पौधों के भाग), एनिमल प्रोडेक्ट (दूध, शहद, मोती आदि) या मेटल, मिनरल्स (लोहा, सिनेबार, कॉपर पाईराईट आदि) हो सकते है,  इन सब को अलग अलग पैरामीटर (मापदंडों) पर टेस्ट किया जाता है। इसके लिए प्रोडेक्ट की मैक्रोस्कोपी, माइक्रोस्कोपी, फिजिकल टेस्टिंग (Physical testing), केमिकल टेस्टिंग (Chemical testing), क्रोमेटोग्राफी (Chromatography i.e. TLC, HPTLC, HPLC, GC), स्पैक्ट्रोस्कोपी (spectroscopy) वगैरह की जा सकती है। इन सब टेस्ट्स के रिजल्ट्स कैसे आने चाहिए यह भी तय होता है, इन तय आंकडो को स्टेंडर्ड स्पेसिफिकेशंस (मानक गुणधर्म) कहा जाता है। अगर मैटीरियल कि टेस्टिंग के रिजल्ट्स स्टेंडर्ड स्पेसिफिकेशंस से कमतर आते है तो यह फेल हो जाएगा और रिजेक्ट कर दिया जाएगा। ये स्टेंडर्ड स्पेसिफिकेशंस मैटीरियल को बार बार टेस्टिंग करके तय किया जा सकते है, इसके अलावा सरकार भी इन्हे फिक्स कर जारी करती है। आयुर्वेद दवा बनाने के लिए काम मे आने वाले रॉ मेडीरियल के स्टेंडर्ड स्पेसिफिकेशंस के लिए द आयुर्वेदिक फार्मेकोपिया ओफ इंडिया पार्ट-1, वॉल्युम i-ix भारत सरकार की ओर से जारी किया गया अधिकारिक (official) डॉक्युमेंट है और जहाँ आवश्यक हो वहां वहां ब्युरो ओफ इंडियन स्टैंडर्ड (BIS), इंडियन फार्मेकोपिया को भी रेफर (संदर्भित) किया जाता है। इन्ही डोक्युमेंटस मे टेस्टिंग करने का स्टेंडर्ड मेथड (तरीका) भी दिया गया है।

कच्ची औषधियों को टेस्ट करने के बाद में जो औषधियां पैरामीटर्स पर खरी उतरती है उनको आगे प्रोसेस किया जाता है इसमें भी जो महत्वपूर्ण स्टेप्स (क्रिटिक्ल स्टेप्स) रहते हैं उनकी भी टेस्टिंग की जाती है। जैसे की किसी मेडिसिन बनाने मे अगर किसी का रस/काढा/चूर्ण बनाकर प्रोसेस करना हो तो इनकी भी टेस्टिंग की जाती है, इसे ही इन-प्रोसेस क्वालिटी टेस्टिंग कहते है। इसके स्पेसिफिकेशन क्या होने चाहिए यह कई बार टेस्टिंग कर तय किए जाते है।

फिर प्रोसेस पूरा होने के बाद तैयार फिनिष्ड प्रोडक्ट की टेस्टिंग (फिनिष्ड प्रोडक्ट क्वालिटी टेस्टिंग) की जाती है। इसमे भी प्रोडेक्ट को अलग अलग पैरामीटर्स पर परखा जाता है। यहाँ भी रॉ मैटीरियल की तरह ही ओरगेनोलेप्टिक (देखकर, सुंघकर) फिर फिसिकल, केमीकल, क्रोमेटोग्राफी, स्पैक्ट्रोफोटोमिट्री, मिलावट, संक्रमण (कोंटामिनेशन) वगैरह की टेस्टिंग़ की जा सकती है। क्लासिकल/शास्त्रिय आयुर्वेद प्रोडेक्ट (वे औषध योग, जो आयुर्वेद शास्त्रों मे बताए गए है) http://www.ccras.nic.in/sites/default/files/Notices/Advertisement-ASUDTAB.pdf  के स्टेंडर्ड स्पेसिफिकेशंस के लिए द आयुर्वेदिक फार्मेकोपिया ओफ इंडिया पार्ट-2, वॉल्युम i-iv, भारत सरकार की ओर से जारी किया गया अधिकारिक डॉक्युमेंट है, बाकी के लिए बार बार टेस्टिंग करके स्पेसिफिकेशंस तय किए जा सकते है।

सेफ्टी टेस्टिंग (Safety testing)

किसी भी प्रोडेक्ट को काम मे लेते समय वह कितना प्रभावी है, कारगर है इससे पहले यह सुनिश्चित करना बेहद जरुरी है की प्रोडेक्ट/दवा सेफ (सुरक्षित) है। कहा भी जाता है safety is number one priority। इसके लिए इनकी कई तरह की टेस्टिंग की जा सकती है, जिसे हम सेफ्टी टेस्टिंग कह सकते है।

आयुर्वेद दवा किसी संक्रामक (बैक्टीरिया, फंगस) से संदूषित (कोंटामिनेटड) तो नही है इसके लिए माइक्रोबियल लोड टेस्ट किया जाता है। शरीर को नुकसान पहुंचाने वाले माइक्रोब्स को एक साथ और ज़रुरत पडने पर अलग अलग टेस्ट किया जा सकता है। 

हमारी मेडिसिन हैवी मेटल्स (मर्करी, लेड, आर्सेनिक, कैडमियम) से संदूषित तो नही इसके लिए हेवी मेटल्स टेस्टिंग की जाती है। हालांकि हैवी मेटल्स और आयुर्वेद को लेकर कुछ मिथ्स (विभ्रांति) भी है। हैवी मेटल्स के लिए जो लिमिट तय है वह हर्बल फोर्मुलेशंस (ऐसी मेडिसिन जिसमे पेड-पौधों के भागो या अंगों से बनाए जाते है) के लिए है। आयुर्वेद मे मर्करी (पारा), लेड (सीसा), आर्सेनिक बहुत सारी औषधियों को बनाने के लिए काम मे लिए जाते है, तो हैवी मेटल्स की लिमिट इन मेडिसिन के लिए नही है।

बहुत सारे हर्ब्स की खेती कि जाती है, इस दौरान इसमे पेस्टीसाइड्स भी काम मे लिए जाते है। अगर पेस्टीसाइड्स को जरुरत से ज्यादा डाला जाता है तो इनके कुछ अंश तैयार दवा मे भी आ सकते है और इंसानो के लिए नुकसान पहुंचाने वाला हो सकता है। इसको टेस्ट करने के लिए आयुर्वेद मेडिसिन मे पेस्टीसाइड्स रेसिड्यु टेस्ट किया जाता है यानि देखा जाता है के ये पेस्तीसाइड्स हर्ब मे आ तो नही गये और अगर है तो भी इंसानो को नुकसान पहुचाने जितनी मात्रा मे तो नही।

अफ्लाटोक्सिन्स एक खास तरह के विषाक्त (टोक्सिन्स) होते है जो की कई तरह के फंगस (Aspergillus flavus and A. parasiticus वगैरह) से उत्पन्न होते है, जो की कैंसर कारक और उत्परिवर्तक भी हो सकते है। संक्रामक फंगस, हर्ब्स को उसके पैदावर होने के दौरान संदूषित करता है और वहां से यह तैयार की गई मेडिसिन मे भी आ सकता है। 14 से ज्यादा अफ्लाटोक्सिंस के बारे मे जानकारी उपलब्ध है, इनमे से चार बी1, जी1, बी2, जी2 ये इंसानो को नुकसान पहुंचा सकते है, इसलिए इन चारों के लिए टेस्टिंग की जाती है।

ये चारों तरह की टेस्टिंग कच्ची औषधि (रॉ मैटिरियल) और तैयार मेडिसिन दोनो मे ही की जा सकती है और की जानी चाहिए।

इन सब टेस्ट मे ठीक पाए जाने पर भी कोई मेडिसिन खासकर नई मेडिसिन वो इंसानो के लिए सेफ होगी ही, ऐसा नही कहा जा सकता, यह जानने के लिए खास तरह के सेफ्टी/टोक्सिसिटी स्टडी (अध्ययन) किए जाते है। इसमे सामन्यतया मुह (ओरल रुट) से मेसिसिन देकर उसकी एक्युट (खाने के तुरन्त बाद पैदा होने वाले हानिकारक प्रभाव के लिए), सबएक्युट (खाने के कुछ दिनो बाद सामने वाले हानिकारक प्रभाव) और क्रोनिक (लम्बे समय तक खाने से पैदा होने वाले हानिकारक प्रभाव) टोक्सिसिटी अध्ययन किए जाते है; ये सभी स्टडीस एनीमल्स (सामान्यतया चूहे) पर आवश्यक अनुमति मिलने के बाद ही की जा सकती है। इन स्टीडज को करने के लिए OECD guidelines अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्य है। इसके अलावा भारत सरकार की ओर से आयुर्वेद दवाओं के लिए जारी खास गाइडलाइंस भी है|

अगर बनाई गई मेडिसिन त्वचा (स्किन) पर लगाने के लिए है तो इसके लिए भी डर्मल टोक्सिसिटी स्टडी की जा सकती है। इसके लिए भी स्किन पर मेडिसिन के एक्स्पोजर टाईम (लगाए रखने के समय) के अनुसार अलग अलग गाईडलाईन ओइसीडी ने जारी की है। ये स्टडी भी एनीमल्स पर ही की जाती है।

इन सबके के अलावा किसी भी मेडिसिन की एक्सपोजर और जिस देश मे इसे काम मे लिया जाना है उसके नियम कानून के अनुसार मेडिसिन की Mutagenicity (उत्परिवर्तन- अगली पीढी मे परिवर्तन होने की क्षमता), carcinogenicity (कैंसर उत्पन्न करने ली क्षमता), skin irritation, skin sensitivity (त्वचा पर जलन/उत्तेजना हो जाना), photo sensitivity (प्रकाश से होने वाली उत्तेजना), ocular safety (आंखों पर पडने वाले प्रभाव) वगैरह की जा सकती है। इन सभी को किस तरह से किया जाना है इसके लिए हर एक टेस्ट की गाइडलाइन है, इनमे से भी ज्यादातर एनीमल्स पर ही की जाती है। भारत मे ये सभी प्रकार के स्टडी करना जरुरी नही। जैसे की हम सब ये जानते है की भारत मे आयुर्वेद हजारों सालो से प्रैक्टिस मे है और हम भारतीय लोग इन औषधियों को ना जाने कितने ही बरसों से काम मे ले रहे है तो ज्यादातर को सेफ़ माना जाता है। ड्रग एण्ड कोस्मेटिक एक्ट के अनुसार कोई भी योग जो आयुर्वेद शास्त्रों (ग्रंथों, जो की, ड्रग एण्ड कोस्मेटिक एक्ट के 1st शेड्युल कि लिस्ट मे है http://www.ccras.nic.in/sites/default/files/Notices/Advertisement-ASUDTAB.pdf) को भारत मे काम मे लेने के लिए किसी प्रकार की टोक्सिसिटी स्टडी करना ज़रुरी नही, हालांकि ये सभी को अफ्लाटोक्सिन, माइक्रोबियल लिमिट, हैवी मेटल्स और पेस्टीसाइड्स मे जरुरी लिमिट मे होना आवश्यक है। अनुभूत योग (Proprietary formulation) के लिए कुछ स्थितिओं मे सेफ़्टी डाटा होना चाहिए। ऐसे योग जिसमे ड्रग एण्ड कोस्मेटिक एक्ट के शेड्युल E1 (Poisonous substances)  मे रखे गये औषधि हो उसमे भी सेफ्टी स्टडी करनी होगी।

एफीकेसी टेस्टिंग (Efficacy testing)

ये बात तय हो जाने के बाद की जो मेडिसिन हम ले रहे है वह सेफ/सुरक्षित है, उसके बाद बात आती है की वह कितनी कारगर और प्रभावी है, जिस उद्देश्य के लिए काम मे लिया जाना है उसमे कितनी असरदार है। इसके लिए जिस तरह का प्रभाव हम उस मेडिसिन से चाह रहे है या तो उसके अनुसार एनीमल (चूहा, बन्दर, कुत्ते वगैरह) मे मॉडल बनाकर या इन्सानो मे मेडिसिन की तय डोज, तय समय के लिए देकर अलग अलग पैरामीटर (मापदण्ड) पर टेस्टिंग करके उसे परखा जाता है।

 (एसे ही किसी भी मेडिसिन का दावा करने पर उसका एनीमल य क्लीनिकल ट्रायल करने की इज़ाज़त नही मिल जाती, उसको तथ्य और उससे सम्बन्धित पहले हुए रिसर्च के आधार पर अपने दावे को रखना होता है)।

मिसाल/उदाहरण से समझते है जैसे की हमारा एक मेडिसिन को लेकर दावा है की यह डायबिटिज मे काम करती है और Blood मे शुगर को कम करने मे प्रभावी है। सबसे पहले उसके ट्रायल (एनीमल/क्लीनिकल) का प्रोटोकोल (ट्रायल कैसे किया जाएगा, इसका पूरा ब्यौरा) एथिकल कमेटी से पास करना जरुरी है, यह कमेटी देखती है की यह दवा ट्रायल मे लिए जाने वाले एनीमल या इंसानो के लिए नुक्सान दायक तो नही, उनके फायदे के लिए ही है। यहां से पास हो जाने पर एनीमल ट्रायल को सीपीसीएसईए   और क्लिनिकल सीडीएससीओ  की ओर से जारी गाइडलाइनस के अनुसार किया जाएगा और सरकार की ओर से आयुर्वेद मेडिसिन के लिए खास गाइडलाइन जारी की गई है  के अनुसार ट्रायल किया जाएगा। क्लिनिकल ट्रायल को क्लिनिकल ट्रायल रजिस्ट्री ऑफ इंडिया मे रजिस्टर  किया जाना चाहिए।

कमेटी से प्रोटोकोल पास हो जाने के बाद मेडिसिन को डायबिटीज के मरीज (जिनकी संख्या तय होगी) को तय समय पर, तय दिनो के लिए, तय मात्रा मे पानी, शहद वगैरह [जिस किसी अनुपान (पानी, शहद आदि) के साथ मेडिसिन दिया जाएगा यह भी तय रहेगा] दी जाती है और उसके बाद Blood sugar मे आये परिवर्तन को वैज्ञानिक तरीके से जांच और एनालाइसिस कर पता किया जाता है की यह प्रभावी है भी के नही और अगर है तो कितनी। जिस देश मे आप इस मेडिसिन को सेल करना चाहते है वहां के नियमो के अनुसार सेफ्टी के साथ-साथ एफीकेसी डाटा पेश करने को कहा जा सकता है। भारत मे आयुर्वेद के क्लासिकल मेडिसिन के लिए किसी ट्रायल की ज़रुरत नही अगर आप शास्त्र मे कहे अनुसार ही प्रयोग मे लेने का दावा करते है, इसके अलावा किसी और तरह का दावा करने पर आपको एफीकेसी का डाटा देना होगा। अनुभूत योग (Proprietary formulation) के लिए आपको इसकी प्रभाविकता के लिए पायलेट (छोटे स्तर) स्टडी पेश करना होगा, तभी आपको वह प्रोडेक्ट बनाकर इसे बचेने या बांटने की परमिशन मिलेगी। https://cdsco.gov.in/opencms/export/sites/CDSCO_WEB/Pdf-documents/acts_rules/2016DrugsandCosmeticsAct1940Rules1945.pdf

अब अगली बार जब कोई कहे की हमारा प्रोडेक्ट टेस्टेड या लैब टेस्टेड है तो किस तरह की टेस्टिंग हुई है, पुछिएगा ज़रुर। यह जानकारी आपको कैसी लगी हमे ज़रुर बताएं, अच्छी लगी तो शेयर करें। आपका सुझाव या सलाह हो तो ज़रुर बतायें।

सर्वे भवंतु आरोग्या।।   

4,454 thoughts on “आयुर्वेद दवाओं/प्रोडेक्ट्स की लैब टेस्टिंग क्या होती है?”

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