कैसे बनती है आयुर्वेद मे दवायें?

Ayurveda medicines

दवायें बहुत तरह की होती है जैसे टेब्लेट, कैप्सुल, सिरप, क्रीम, ओइंट्मेंट वगैरह। पर जब बात आयुर्वेदिक दवाओं की आती है तो हम मे से ज्यादतर लोगों के सोच मे आते है चूरण, च्यवनप्राश, काढा, पुडिया और साथ मे ही इमाम्दस्ते या ओखली या खल्ल इन सब चीजों की तस्वीर भी सामने आ जाती है। सबको लगता है की शायद सारी या ज्यादातर दवायें आयुर्वेद मे इन्ही से बन जाती है; ये बात बहुत कम हद तक ही सही है। असल मे आयुर्वेद मे दवा बनाने मे बहुत तरह की चीजें, प्रक्रिया की जाती है। क्या आपनी कभी सोचा है की आयुर्वेद की फार्मेसी मे जहां सैंकडों, हज़ारों किलो दवाईयां बनती है वो कैसे बनती है? चलिए जानते है:

सबसे पहले तो मैं आपको यह बता दूं कि आयुर्वेद में बहुत तरह की दवाइयां बनती है जैसे चूर्ण, जिसको हम चूरण बोल देते हैं; काढ़ा, जूसेस उसको आयुर्वेद में रस या स्वरस बोलते हैं, इसके अलावा टेबलेट (गोलियां), कैप्सूल, बहुत सारे सिरप, फर्मेंटेड फॉर्मूलेशंस और च्यवनप्राश जैसी दवा जिनको आयुर्वेद की भाषा में अवलेह बोलते हैं जो की चटनी जैसा चीज रहता है; मेडीकेटेड तैल, घी, एनीमा वगैरह बनाये जाते है। इन सब के अलावा आयुर्वेद मे बहुत सारे मेटल (धातु), मिनरल (खनिज) से भी कई तरह की दवायें बनाई जाती है जिनको भस्म, रसौषधि बोला जाता है। आज तो आयुर्वेद मे क्रीम, शैम्पू, बाम, लोशन, ऑइंटमेंट्स, लिनिमेंटस बनाना भी बहुत आम बात है। इन सब को बनाने के लिए अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग तरह के तरीके काम में लिए जाते हैं कुछ जगहों पर बिल्कुल पुराने पारम्परिक तरीके से चीजें बनाई जाती है; कहीं पर कुछ पारंपरिक तरीको के साथ साथ नई तकनीक (मॉडर्न टेक्नोलॉजी) काम मे ली जाती है और कहीं पर और एडवांसमेंट होकर मॉडर्न टेक्नोलॉजी से बहुत सारी चीजें की जाती है चलिए हम इनको बारी-बारी से जानते हैं, कौन सी तरह की दवा किस तरह के मशीनों से या किस तरह के तरीकों से बनाई जाती है।

चूर्ण/ पाउडर

आयुर्वेद का नाम लेते ही सबसे पहले दवाई दिमाग में आती है चूर्ण, पाउडर। पाउडर को बनाने का एक तो तरीका वही है जो हम घरों में भी करते हैं कि औषधि को इमामदस्ते मे कूट पीस लो और काम मे ले लो। पर जब फार्मेसी मे कोई भी दवा बनाई जाती है तो उसे बनाने से पहले, बनाने के दौरान और बनने के बाद दवा को कई मापदंडो (पैरामीटरस) पर इसकी टेस्ट किया जाता है। जो भी कच्ची औषधि आती है उसको सबसे पहले साफ किया जाता है साफ करने के बाद में अगर वह हार्ड (कठिन) है तो पहले उसके छोटे टुकड़े किए जाते है इसके लिए डिसइंटीग्रेटर नाम की मशीन काम मे ली जाते है, फिर उसको पल्वराईजर नाम की मशीन से महीन पाउडर कर लिया जाता है और अगर ऐसा नहीं है, वह जडी बूटी मृदु (सॉफ्ट) है तो उसको सीधा ही पल्वराईजर में डालकर के बारीक पाउडर कर लिया जाता है। अलग अलग काम के लिए पाउडर का आकार (पार्टिकल साइज़) अलग रखा जाता है, जैसे की काढे के लिए मोटा दरदरा चूर्ण काम मे लिया जाता है, तो सीधा खाने के लिए पाउडर बनाते हैं तो बिल्कुल महीन किया जाता है इसके लिए पल्वराईजर मे अलग अलग जाली लगाई जाती है। अगर दो या दो से ज्यादा चूर्ण को मिलाना हो तो मास मिक्सर काम मे लिए जाते है। इन सबके बाद चूर्ण को एयर टाइट पैकेट या कंटेनर मे पैक कर दिया जाता है।

रस/स्वरस/जूस

इसके बाद हम समझेंगे कि ज्युसेस किस तरह से तैयार किए जाते हैं। ज्युस को आयुर्वेद की भाषा में स्वरस या रस बोला जाता है। हम बाजार में देखते होंगे आंवला जूस, एलोवेरा जूस इस तरह से बहुत सारे दवाओं के तैयार ज्युस मिलते है, ये सब कैसे तैयार किए जाते है? यह बात हम समझते हैं कि जूस जो है वह ताजा फल, सब्जी, शाक, जडी बूटी से निकाला जाता है। सबसे पहले औषधि को इकट्ठा किया जाता है चाहे वह खुद इकट्ठा करें या फिर मंडी से ताजी औषधि को खरीद करके लाए फिर उसको अच्छे से पानी से साफ किया जाता है। साफ करने के बाद में उसको औषधि के हिसाब से आगे प्रोसेस किया जाता है जैसे अगर एलोवेरा जूस है तो उसका छिलका हटाया जाएगा, अगर आंवले का जूस है उसके उसका गुठली निकाला जाएगा; इस तरह से जो प्राथमिक क्रियायें जैसे छिलके को या गुठली को अलग करना की जाती है। कुछ जगहों पर यह पूरी तरह मशीनों से होती है और कुछ जगहों पर हाथ से यानी वर्कर करते हैं। इस तरह की मशीनो को काम के हिसाब से डिजाइन की जाती है। अब इसे सीधे ही या छोटे टुकडे‌ (ग्राइंडर मे) करके एक्सप्रेसर मे से ज्युस एक्सप्रेस किया जाता है (निकाला जाता है)। फिर इस जूस को फिल्टर कर लिया जाता है जिससे कि जो रेशे आदि अलग कर लिया जाता है और बड़े कंटेनर मे रखा जाता है। अब यह खराब ना हो और यदि कुछ जीवाणु (बैक्टीरिया) आदि हो तो उनको खत्म करने के लिए जूस को पाश्चराइज किया जाता है, इसके लिए इसे एक नियत तापमान पर एक निश्चित समय के लिए रखा जाता है। यह होने के बाद इसमें शक्कर (यदि आवश्यक हो तो), स्टेबलाइजर जो उसको स्टेबल रखे इस तरह के रसायन, पीएच कंट्रोलर या फिर एसिडिटी रेगुलेटर, एंटीऑक्सीडेंट्स, प्रिजर्वेटिव्स इस तरह की चीजें आवश्यकता के हिसाब से डाली जाती है जो इसे लम्बे समय तक खराब होने से बचाए, इसे स्वाद और स्वास्थ्यवर्धक बनाए रख सके। अब इसको पैक किया जाता है जो की छोटे पैक्स भी हो सकते है जिनको आप तुरंत पी सकते हैं या बडे 1 लीटर 2 लीटर के पैकेट आते हैं जिनमें आप रोज 40-50ml जिसको पीते हैं तो जो रोज खुलता है उसके अंदर प्रिजर्वेटिव या वह खराब ना हो इसके लिए कुछ चीजें डालने की जरूरत होती है क्योंकि वह रोज वातावरण के संपर्क में आ रहा है और हो सकता है कि जो एक बार में खोलते ही पूरा पी लिया जाएगा उसमें शायद इस चीज की आवश्यकता कम पड़े।

आसव-अरिष्ट/फर्मेंटेड मेडिसिन

आयुर्वेद में एसी औषधि भी बनाई और काम मे ली जाती है जिनमे एल्कोहोल होता है, इनको आसव और अरिष्ट कहते है। घबराइये नही यह कोई शराब नही है और ना ही किसी दवा मे शराब मिलाई जाती; औषधियों को इस प्रकार से प्रोसेस किया जाता है, उनमे अपने आप एल्कोहोल उत्पन्न हो और यह भी एक सिमित मात्रा मे बहुत ज्यादा नही। औषधि का पाउडर बनाकर या तो इसे सीधा ही पानी में डालकर या इसका काढा बना कर उसमें इसके साथ शक्कर/गुड़ के साथ में उबालकर अथवा जहां निर्देशित हो वहां शहद डालकर और ऊपर से कुछ तय दवायें डालकर, इस पूरे मिक्सचर को अच्छे से बंद (सील) करके एक जगह पर एक तय समय के लिए बिना छुए और हिलाए रख दिया जाता है। इसमें औषधियों के धीरे-धीरे किण्वन/संधान (फर्मेंटेशन) होने से अपने आप अल्कोहल तैयार होता है एक निश्चित समय के बाद जब यह संधान पूरा हो जाता है तब खोल कर इसको कुछ टेस्ट किए जाते है। ठीक होने पर इसे पहले निथार लिया जाता है फिर अच्छे से फिल्टर कर पैक कर दिया जाता है। ये दवा अपने आप मे बहुत प्रभावी होती है और खास स्थिति मे देने के लिए ही बनाई जाती है। फार्मेसी मे आसव अरिष्ठ बनाने के लिए फर्मेंटर और स्टेनलेस स्टील के बडे बडे कंटेनर और कहीं कहीं पारम्परिक लकडी के कंटेनर काम मे लिए जाते है। काढ़ा बनाने के लिए पारंपरिक भट्टी अथवा विशेष प्रकार के भाप से गर्म होने वाले या गर्म तेल से गर्म होने वाले जैकेटिड वेसल (खास बर्तन) काम में लिया जाता है। टेस्टिंग मे एल्कोह्ल की मात्रा भी देखी जाती है।

अर्क

आयुर्वेद में खुशबुदार औषधियों को काम में लेने की एक अलग प्रकार की व्यवस्था है। जिन औषधियों में महक होती है अगर उन्हें थोड़ा सा भी ज्यादा गर्म कर दिया जाए या ज्यादा कूटा पीटा जाए तो उनके अंदर की खुशबू चली जाती है तो ऐसी औषधियों का आयुर्वेद में अर्क बनाकर के काम में लिया जाता है। आपने गुलाब जल, केवड़ा जल इस तरह के नाम सुने होंगे यह अर्क ही हैं। आयुर्वेद में बहुत सारी औषधियों जैसे पुदीना, सौंफ़, सोवा, पुनर्नवा, अजवाइन और कभी-कभी एक से ज्यादा औषधियों को मिलाकर के अर्क निकाले जाते हैं और बहुत सारी बीमारियों जैसे पेट दर्द उल्टी आना के लिए काम में लिया जाता है। अर्क को बनाने के लिए डिस्टलेशन मेथड जिसको की तिर्यक पातन भी कह सकते हैं को काम में लिया जाता है। इसमें औषधि को पानी के साथ एक बर्तन में डाल दिया जाता है इस बर्तन से एक पाइप जुड़ी रहती है जोकि दूसरी तरफ अर्क को इकट्ठा करने वाले बर्तन में खुलती है यह पाइप एक दूसरी पाइप से ढकी रहती है जिसमें कि ठंडे जल बहता रहता है। अर्क बनाने के लिए पहले वाले बर्तन को धीरे-धीरे गर्म किया जाता है जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है पानी की भाप के साथ में औषधि के खुशबूदार और आवश्यक तत्व भाप के साथ में बीच में ठंडी नली से होते हुए दूसरे बर्तन में अर्क बनकर आ जाते है। अर्क कितना निकाला जाता है यह औषधि और लिए गए पानी की मात्रा के हिसाब से निश्चित होता है और इसे धीमी आंच पर ही निकाला जाता है। फार्मेसी में अर्क बनाने के लिए भी यही मेथड काम में लिया जाता है सिर्फ इसके लिए बड़े-बड़े डिस्टलेशन असेंबली लगाए जाते हैं यह कांच या स्टील के हो सकते हैं जिनमें एक साथ में सैंकडो लीटर की प्रक्रिया को किया जा सकता है। अर्क को प्रिजर्वेटिव्स डालकर अथवा कहीं-कहीं बिना डाले पैक कर दिया जाता है। अर्क को काम में लेने की मात्रा कुछ बूंदों से लेकर कुछ एमएल तक हो सकती है।

Distillation apparatus

मेडीकेटड घी और तैल:

घी और तैल तो हमारे जीवन मे लगभग रोज़ काम मे आते है। आयुर्वेद मे घी और तैल को औषधिओं के साथ पकाकर मेडीकेटेड घी और तैल तैयार किए जाते है और अलग अलग स्थिति मे सेवन, अभ्यंग (मालिश), नस्य (नाक से दवा देने की खास विधि), बस्ति (एनीमा) के काम मे ली जाती है। आयुर्वेदिक मेडीकेटेड घी के लिए गाय के दूध से निकाला देसी घी और तैल मे तिल, नारियल और कुछ जगह सरसों का तैल काम मे लिया जाता है। इनको औषधियों के पेस्ट जिसे कल्क कहते है और एक्सट्रेट यानि काढे के साथ पकाया जाता है, यह ठीक से तैयार हुआ के नही यह परखने के कई तरीके है जिनमे कुछ पारम्परिक भी है और कुछ लेबोरेट्री मेथड भी है। फार्मेसी मे घी, तैल बनाने के लिए पुराने तरीके से भट्टी, कढाई या स्टीम या ओइल जैकेटड वैसल्स काम मे लिए जाते है। जैकेटड वैसल्स खास तरह के दो परतों वाले स्टेनलेस स्टील के बडे बरतन होते है, इन दोनो परतों के बीच मे भाप या गर्म तैल बहाकर गर्म किया जाता है, इनमे तापमान को कंट्रोल करना आसान होता है। सही से पक जाने के बाद फिल्टर करके सामान्य तापमान पर ठण्डा हो जाने पर पैक कर दिया जाता है।

Jacketed vessel

अवलेह:

च्यवनप्राश शायद वर्तमान मे सबसे प्रसिद्ध आयुर्वेदिक प्रोडक्ट होगा, च्यवनप्राश सरीखी दवायें आयुर्वेद मे अवलेह की कैटेगरी मे आती है। इसमे औषधि के रस या काढे को गुड या शक्कर के साथ गर्म किया जाता है उबाला जाता है (तय समय के लिए निश्चित मापदंड तक पहुंचने तक), और ग़ाढा किया जाता है फिर यदि निर्देशित हो तो और भी औषधि (जैसे च्यवनप्राश मे घी और तैल मे भुना हुआ आवंला पेस्ट), औषधियों के पाउडर, घी, तैल, शहद आदि डाले जाते है। यह इतना गाढा रखा जाता है की इसे चम्मच से आसानी से खाया जा सके। फार्मेसी मे इसे बनाने के लिए काढा बनाने मे काम आने वाले वेसल्स ही काम मे आते है, मावा/खोया बनाने के लिए दूध को पकाने के लिए जो मावा मेकिंग मशीन काम मे ली जाती है उसे भी अवलेह पकाने के काम मे लिया जाता है। चूर्ण वगैरह अच्छे से मिलाने के लिए एजीटेटर्स को काम मे लिया जाता है। यह बहुत ज्यादा गाढा या पतला नही होना चाहिए।

Awaleha making machine

सिरप:

अवलेह मे ही बताए अनुसार अगर औषध के काढे या रस को शक्कर के साथ पकाकर अगर गाढा तरल ही रखा जाए तो यह सिरप बनेगा, सिरप मे दो तिहाई (67%) भाग शक्कर ही रखी जाती है। इसमे शक्कर जमे नही, इसकी कंसनट्रेश्न सही बनी रही, इस पर बैक्टीरिया, फंगस ना बने इन सब के लिए कुछ केमिकल बहुत थोडी मात्रा मे डाले जाते है।

टेब्लेट/गोली/वटी/पिल्स:

टेब्लेट की बात करें तो दो तरह के टेब्लेट बनाए जाते है एक तो उसी तरह की जो हम आम तौर पर देखते है और दूसरी पुराने आयुर्वेद तरीके से बनाईए हुई जिसे वटी या गुटिका भी कहते है।

टेब्लेट बनाने के लिए सबसे पहले जो भी घटक द्रव्य (इनग्रीडियंट) है, उन सबको बारीक पाउडर कर लिया जाता है और मास मिक्सर मे सबको मिला लिया जाता है। अब इसमे वेट या ड्राई बांईडर मिलाया जाता है जैसे गम (गोंद), स्टार्च पेस्ट, इथाईल सेलुलोज वगैरह, जो की टेब्लेट मे सब घटको को आपस मे जोडे रखने का काम करते है। अब इसे पेस्ट बनाकर गूंथा जाता है और डैम्प मास (नम पिंड) बना लिया जाता है। इस मास को एक जाली से गुजारते हुए इसके ग्रेन्युल तैयार किए जाते है और फिर इन ग्रेन्युल्स को सुखाया जाता है। सुखे ग्रेन्युल्स मे लुब्रिकेन्ट्स, प्रिज़र्वेटीव्स, डिसिंटीग्रेटर ज़रुरत के हिसाब से मिलाए जाते है। फिर इन ग्रेन्युल्स को टेब्लेट पंचिंग/ टेब्लेट कम्प्रेशन मशीन मे टेब्लेट की शक्ल मे पंच किया जाता है। इन टेब्लेट्स को टेल्कम पोडर के साथ पोलिशिंग पैन मे पोलिश किया जाता है, जिससे ये और साफ और बराबर सतह वाली हो जाती है, इसके बाद अगर ज़रुरत हो तो टब्लेट को कोटिंग पैन मे शक्कर या किसी चाहे गये रंग मे कोटिंग किया जा सकता है। इन तैयार टेब्लेट्स को ब्लिस्टर, स्ट्रिप, बोटल मे पैक किया जाता है।

Tablet compresion machine

आयुर्वेद के पारम्परिक तरीके से वटी बनाने के लिए सबसे पहले औषधियों के महीन चूर्ण को आपस मे एक एक कर मिलाते हुए खरल या एंड रनर मे घोटा जाता है और बताए गए औषध के काढे या रस या साफ पानी के साथ मे घोट कर गुंथा जाता है। औषध द्रव्यों के गुणो के अनुसार या तो या तो हाथों से ही वटियां बना ली जाती है या फिर गुंथे हुए मिक्सचर के ग्रेन्यूल बनाकर इनको पोलिशिंग पैन में चलाते हुए ऊपर से घटक द्रव्यो की परत चढ़ाकर वटी तैयार की जाती है कभी-कभी गुंथे हुए मिक्सचर को थ्रेड मेकिंग मशीन में डालकर थ्रेड (धागेनुमा) बनाकर थ्रेड को थ्रेड कटिंग मशीन से वटी के साइज मे काट लिया जाता है फिर इन्हें पॉलिशिंग पैन में चला कर अच्छी तरह से गोल वटी की शेप में बना लिया जाता है फिर अच्छे से सुखाकर पैक कर दिया जाता है

आयुर्वेद मे बहुत सारे मिनरल (खनिज) और मेटल्स (धातु) से भी अनेक तरह की औषध फार्मेसी मे बनाई जाती है, हरेक को खास तरह से प्रोसेस करके भस्म, सिंदुर, पोटली, पर्पटी कैटेगरी मे दवा बनाई जाती है। इस पर पूरे विस्तार से आगे के किसी अंक मे बताया जायेगा।

आपको जानकारी कैसी लगी, बताएं।

46 thoughts on “कैसे बनती है आयुर्वेद मे दवायें?”

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