डायबिटीज वास्तव मे एक रोग नही है

डायबिटीज एक रोग नहीं है अपितु स्वस्थ सुंदर जीवन जीने के लिए स्व प्रबंधन व आत्म नियंत्रण की प्रेरणा है।  डायबिटीज का होना तो प्रकृति का आमंत्रण है जो संयमित आहार-विहार अपनाने के लिए प्रेरित करता है। परंतु यदि व्यक्ति लापरवाह हो जाए यह सबसे भयानक रोग भी हो सकता है, तो इसे जानना समझना ज़रुरी है, चलिए आज इसे ही जांनते है।

वर्तमान समय में हमने वेस्टर्न कल्चर जीवन शैली को अपने जीवन में बहुत अपनाया हुआ है जो हमें निष्क्रिय एवं सुस्त बनाती हैl आजकल मधुमेह रोगियों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है बदलती जीवन शैली तनाव और आहार-विहार के गलत तरीके के कारण डायबिटीज तेजी से बढ़ रही है। International Diabetes Federation की 2020 की रिपोर्ट के अनुसार भारत मे 7 करोड 70 लाख से अधिक डायबिटिज रोगी है, यह स्ंख्या भी तेजी से बढ रही है।

आज डायबिटीज रोगी चिकित्सा निरंतर लेते हुए भी असहज महसूस करता है और वह आयुर्वेद चिकित्सा की ओर आशा भरी निगाह से देखता है ऐसी परिस्थिति में आइए जानते हैं कि आयुर्वेद कैसे डायबिटीज रोग का बेहतर प्रबंधन कर सकता है:

सबसे पहले हम यह समझते है की आयुर्वेद और आधुनिक मतानुसार डायबिटीज क्या है?

आयुर्वेद मतानुसार डायबिटीज को प्रमेह के अंतर्गत समझा जा सकता है, तीनों दोषों के प्रकोप (विशेषत:कफ दोष) व सप्त धातुऒ (विशेषत:मेद धातु) को दूषित करने वाले आहार-विहार के सेवन से वातज पितज एवं कफज प्रमेह उत्पन्न होती है, इनमें कफ़ज प्रमेह साध्य, पितज प्रमेह औषधि सेवन के साथ साध्य और वातिक प्रमेह असाध्य होता है। आधुनिक मतानुसार डायबिटीज चयापचय (मेटाबॉलिज्म) प्रणाली से (चयापचय-एक प्रक्रिया है जिसमें भोजन को ऊर्जा में बदला जाता है) सम्बन्धित रोग है, जिसमें इंसुलिन [इंसुलिन हार्मोन है जो नित्य अग्नाशय (Pancreas) से निकला करता है तथा डायबिटीज में इसकी कार्यक्षमता वैसी नहीं रहती है जैसी एक स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में रहती है] हार्मोन या तो प्रभावी रूप से कार्य नहीं करता है (type 2 DM ) या इस हार्मोन का स्त्रावण ही अत्यल्प हो पाता है (Type 1 DM) जिसके फलस्वरूप रक्त की शर्करा की मात्रा जरूरत से अधिक हो जाती है जिसे हम शुगर  का बढ़ना कहते हैं।

डायबिटिज के कारण

शुगर बढ़ने के प्रमुख कारणों में आधुनिक विज्ञान मोटापा, पारिवारिक इतिहास, उम्र,  शारीरिक निष्क्रियता, पर्यावरणीय कारण, ओटोएंटीबॉडी का बनना  इत्यादि महत्वपूर्ण कारको को मानता है।

आयुर्वेद के अनुसार डायबिटीज के कारण- आयुर्वेद शास्त्र में  दोषो में असंतुलन होने के प्रत्येक रोग के अलग-अलग कारण होते हैं ,डायबिटीज के लिए निम्न कारण हैं….

आहार (Dietary factors) 

  1. आयुर्वेद के अनुसार गुरु ,स्निग्ध गुणो, अम्ल, लवण ,मधुर रस से युक्त आहार के अधिक मात्र मे लबे समय तक सेवन से मधुमेह होने के अवसर बनते है, जैसे-मिठाइयां, कोल्ड ड्रिंक,  पिज्जा, बर्गर, पनीर, गुड एवं गुड़ से बने पदार्थ, दूध एवं दूध से बने पदार्थ, दही, उड़द, अरहर की दाल,  मांस सेवन इत्यादि का अतिमात्रा में दैनिक प्रयोग से  डायबिटीज के अवसर बढ़ जाते हैं|
  2.  नए अनाज व पान का अधिक मात्रा में सेवन। (नए से तात्पर्य जो अभी इसी सीजन में जो अनाज पैदा किया गया है, जैसे ताजा तैयार चावल, ताजा बनी शराब)|

ज़ीवनशैली/ विहार जन्य कारक (Lifestyle factor)

  1. अधिक आरामदायक जीवन शैली (लंबे समय तक सोना ,बैठना, चिंता फिकर न करना)|
  2. शारीरिक निष्क्रियता अर्थात व्यायाम या शारीरिक श्रम ना करना या बहुत कम करना|
  3. नियत समय पर शरीर का शोधन (पंचकर्म) इत्यादि का न होना।
  4. अत्यधिक चिंता ग्रस्त होना तनाव युक्त होना

आनुवांशिक कारण (Genetic factor)

सहज (By birth)

डायबिटीज के पूर्वरूप (Prediabetic condition)

डायबिटीज को साइलेंट किलर कहते हैं, क्योंकि जब तक यह रोग हो ना जाए तब तक इसके लक्षणों का आभास ही नहीं हो पाता| परंतु आयुर्वेद में ऐसे लक्षणों के बारे मे भी बताता है जो भविष्य में डायबिटीज होने का संकेत देते हैं अगर इन पर समय रहते नियंत्रण कर लिया जाए तो डायबिटीज होने से बचा जा सकता है आइए जानते हैं कि यह लक्षण कौन से हैं…

1. मुख में मीठा पन का आभास होना

2. हाथ पैरों में सुन्नपन चीन्टी चलने जैसा आभास होना और उनमें जलन का होना

3.  मुख व तालु का बार-बार सूखना अर्थात प्यास का अधिक लगना

4. कान, नाक व जीभ पर मल का अधिक बनना।

5. मूत्र में मक्खियों व चीटियों का लगना।

6. बाल और नाखून का जल्दी-जल्दी बढ़ना।

अगर इन लक्षणों का व्यक्ति को आभास हो जाए तो तुरंत वैद्य या चिकित्सक की सहायता से आहार -विहार संबंधी सलाह लेकर जीवनशैली में परिवर्तन कर डायबिटीज होने से बचा जा सकता है।

डायबिटीज के लक्षण (features of Diabetes)

1. बार बार पेशाब का लगना (Polyuria)

2. भूख और प्यास का बढ़ना और बार बार लगना (Polyphagia & polydipsia)

3. लगातार थकान महसूस होना (fatigueless)

4. अचानक वजन का कम होना (Sudden loss in weight)

5. घाव का जल्दी ना भरना (slow healing)

6. आंखों में धुंधलापन का आना अर्थात (Blurred vision)

7. मूत्र और त्वचा संबंधी संक्रमण का बढ़ना (Urinary and skin infections)

डायबिटीज का आयुर्वेदिक प्रबंधन एवं उपचार (Management of Diabetes)

व्यक्ति अपने जीवन में आहार-विहार को संयमित कर दिनचर्या, ऋतुचर्या का पालन कर एवं नियमित व्यायाम के द्वारा प्रमेह को नियंत्रित कर सकता है एवं लंबा स्वस्थ जीवन जी सकता है। आयुर्वेद डायबिटिज नियंत्रण के लिए व्यायाम, पथ्य-अपथ्य पालन, पंचकर्म और औषधियों (आयुर्वेदिक) पर जोर देता है।

व्यायाम

 डायबिटीज के रोगी को सक्रिय जीवनशैली अपनानी चाहिए और व्यायाम बिना किसी दवा के डायबिटीज का बेहतरीन प्रबंधन है। डायबिटीज के रोगी को निरंतर एवं नियमित व्यायाम के रूप में दौड़ना, पैदल चलना, आसन प्राणायाम, ध्यान, साइकलिंग डांसिंग, जोगिंग इत्यादि को अपनाना चाहिए। आसन के रूप में भुजंगासन ,पवनमुक्तासन मत्स्येंद्रासन, पश्चिमोत्तानासन, सूर्य नमस्कार इत्यादि के परिणाम फायदेमन्द हो सकता हैं। प्राणायाम के रूप में कपालभाति एवं नाड़ी शोधन किया जा सकता है और ध्यान लगाने से मानसिक संतुलन बनता है जिससे शुगर को नियंत्रित किया जा सकता है

पथ्य-अपथ्य आहार-विहार

(पथ्य से तात्पर्य- जिन आहार या क्रियाओ का प्रयोग लाभदायक है) डायबिटीज होने के जो कारण हैं, अगर उनसे रोगी बच जाए तो डायबिटीज के प्रबंधन में आसानी हो जाती है, शर्करा नियंत्रण के लिए रोगी को क्या दिया जाना चाहिए। इसका निर्णय वैद्य या चिकित्सक के की सलाह से ही किया जाना चाहिए, परंतु फिर भी डायबिटीज के रोगी को निम्न सामान्य बातों का ध्यान रखना चाहिए:

  • डायबिटीज के रोगी को नियमित समय पर ही भोजन करना चाहिए।
  • रोगी को मिश्रित अनाज (गेहूं +जो) इत्यादि का प्रयोग करना चाहिए,एवं  अनाज  कम से कम 1 वर्ष पुराना हो।
  • रोगी को कफ़ वर्धक व मेद वर्धक आहार से उचित दुरी बनानी चाहिए। जैसे उडद, अरहर, चावल, आलु, पनीर, दुध एवं दुध से बने पदार्थ, दही, गुड, चीनी से बने पदार्थ, कोल्ड ड्रिंक, पिज्जा, बर्गर इत्यादि।
  • सांयकालीन भोजन सूर्यास्त के समय ही कर लेना उतम रहता है।
  • शारीरिक रूप से सक्रिय जीवन शैली अपनानी चाहिए जैसे आसन, व्यायाम, कृषि कार्य, गार्डनिंग, पशुपालन आदि।
  • माँसाहार, मदिरा, और धूम्रपान से यथासंभव बचना चाहिए।
  • डायबिटीज के रोगी को कफ नाशक आहार का सेवन जैसे तक्र,  मूंग ,जो ,गेहूं ,शहद का  प्रयोग यथासंभव करना चाहिए

पंचकर्म और आयुर्वेदिक औषधियां:

   चयापचय से सम्बन्धित रोगो के प्रबंधन में आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की अपनी कुछ सीमाएं हैं जिनके कारण रोगी आयुर्वेद और अन्य चिकित्सा विकल्प अपनाने का भी सोचता है। आयुर्वेद में चिकित्सा आधुनिक चिकित्सा विज्ञान से थोडा से भिन्न है इसमें डायबिटीज रोगी के शर्करा के स्तर को संतुलन में रखने के लिए ही नहीं अपितु उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने हेतु प्रयत्न किए जाते हैं। डायबिटीज रोगी के  दॊषो के संतुलन के लिए पंचकर्म और आयुर्वेदिक औषधियां दी जाती हैं जो निम्न प्रकार हैं

1.उद्वर्तन (चुर्ण द्वारा मालिश)

आयुर्वेद और आधुनिक दोनों मतों के अनुसार डायबिटीज और pre-diabetic रोगी में एक्स्ट्रा फैट /मेद को कम करने के लिए सुझाव दिया जाता है उसी एक्स्ट्रा फैट को कम करने के लिए उद्वर्तन एक शानदार उपाय है।

 उद्वर्तन में विशेष औषधीय पाउडर से शरीर की मालिश की जाती है जिससे शरीर का कफ़ और मेद  कम हो जाते हैं इसके लिए रोगी के अनुसार मालिश करने वाले चूर्ण का चयन किया जाता है जैसे त्रिफला चूर्ण कुटज छाल चुर्ण आदि।

2.वमन कर्म

शरीर के मालिश व स्वेदन कर्म कराने के पश्चात विशेष औषधियों के सेवन से उत्प्रेरित कराकर उल्टी कराने की प्रक्रिया को वमन कर्म कहते हैं इसके द्वारा बड़े हुए कफ़ पित दोषों का नाश किया जाता है जिससे शुगर में अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं।

3.विरेचन कर्म-

शरीर के मालिश स्वेदन कर्म कराने के पश्चात रोगी को विशेष औषधियों के द्वारा उत्प्रेरित करवा कर दस्त लगाने की प्रक्रिया विरेचन कर्म कहलाती है , इसके द्वारा पित्त दोष को निकाला जाता है। इन सब के अलावा पंचकर्म की ही बस्ती कर्म और शिरोधारा, धान्याम्लधारा जैसे क्रियाकल्प भी करवाए जाते हैं।

आयुर्वेद मे प्रमुख डायबिटिज नियन्त्रक औषधिया

किसी भी रोग से पीड़ित रोगी को पंचकर्म एवं आयुर्वेदिक औषधियों का प्रयोग वैद्य और चिकित्सक की सलाह से ही करना चाहिए ,स्वत:औषधि सेवन से दोषों का असंतुलन होता है और नए रोगो को उत्पत्ति की संभावना बढ़ जाती है। डायबिटीज के लिये आयुर्वेद मे आंवला, दारूहल्दी, जामुन बीज चूर्ण, मेथी चूर्ण, गुड़मार, गिलोय चूर्ण, शिलाजीत, कत्थक खदिरादि कषाय,  लोधरादी चूर्ण, वंग भस्म, यशद भस्म, त्रिवंग भस्म, वसंत कुसुमाकर रस, आरोग्यवर्धिनी वटी, चंद्रप्रभा वटी इत्यादि औषधियों का रोग एवं रोगी की अवस्था के अनुसार प्रयोग करते हैं।

(किसी भी प्रकार से आहार-विहार मे परिवर्तन, औषधि आदि उचित वैद्यकीय परामर्श से ही लें।)

सर्वे भवंतु आरोग्या॥

12,404 thoughts on “डायबिटीज वास्तव मे एक रोग नही है”

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